Tuesday, July 14, 2009

काकाज़ की किस्ती

ऐ दौलत भी लेलो ऐ शहरात भी लेलो
भले चीन लो मेरी जवानी
मगर लौतादो मुझे वो बचपन का सावन
वो काकाज़ की किस्ती वो बारिश का पानी

कड़ी धुप में अपने घर से निकलना
वो चिडिया वो बुलबुल वो तितली पकड़ना
वो पीपल की चिल्लो के प्यारे से तोहफे
वो गुडिया की शादी में लड़ना झगड़ना
वो झूलों में गिरना गिरके संभलना
वो टूटी हुयी चूडियों की निसानी

मुहल्ले की सबसे पुरानी निसानी
वो बुदिया जिसे बच्चे कहते थे नानी
वो नानी की बातों में परियों की डेरा
वो चहरे की झुरियों में सदियों का फेडा
भुलाए नही भूल सकता है कोई
वो छोटी सी राते लम्बी कहानी।

yahaa suniye





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